Saturday, 24 March 2012

मैं

मैं

मैं  और मेरी तन्हाईयाँ  बिलकुल
अकेले  हैं
लेकिन  कभी -कभी
जब परछाई देती है साथ
तब
मैं  महसूस करती हूँ
कि मैं अकेली नहीं  हूँ
लेकिन जब
कभी परछाई भी छिप जाती है
तब मैं
फिर से
अकेली हो जाती हूँ
बहाने लगती  हूँ आंसू
गोया सारे ज़माने  का
गम सिमट आया हो
इन उदास  आँखों  में
फिर कुछ देर बाद
आंसू पोंछ  कर
सब कुछ पीछे छोड़  कर
अपनी  परछाई  के
साथ  कदम से कदम
मिलाने लगती हूँ
फिर मैं अकेली नहीं  रहती
  

Friday, 9 March 2012

एक प्रश्न

                                  एक प्रश्न
           कौन  होते है  ये आतंकवादी लोग ?
इंसान को इंसान न समझने वाले
क्या  वो खुद इंसान नहीं होते ?
क्या वो हमारी  तरह दुखी नहीं  होते ?
क्या उनके  पास एक दिल रूपी
 मशीन  नहीं होती ?
क्या उस दिल  रूपी मशीन  में कोई 
कलपुर्जा  नहीं  होता ?
या  महज वो  मशीन गन  और कारतूस
का प्रयोग  करने वाली  यंत्रचालित  मशीनें हैं
         जो तथाकथित  नेताओं  की
विदेशी नीतियाँ   ,बाहरी  शक्तियों की

कठपुतलियाँ  मात्र  हैं
या  कुछ  और    भी -----------

कुछ लोग

कुछ लोग  मुर्दों  के नाम
का सहारा लेकर जीने का प्रयास करते  है
क्योकि वो एक अनजानी
जिंदगी  से डरते है
शायद वो नहीं जानते
कि वो क्या कर रहे है
मुर्दों के नाम का सहारा
लेकर वो मौत से नहीं
बच सकते
वो क्यों नहीं
हिम्मत से काम लेकर
   अनजाने  भय  का मुकाबला  करते
शायद वो इस भय पर
विजय प्राप्त  कर ले
और अपने पुराने
नाम को फिर  से
प्राप्त  कर ले
जब नाम बदल कर मौत से
लड़  नहीं पाते
तो मौत से क्यों घबराते है
मृत्यु   तो अमरता का दूसरा नाम  है
फिर किसी और के नाम का सहारा  क्यों -----?

Sunday, 6 November 2011

हे भगवान !

हे भगवान !
तुम शायद जिस सृष्टि के
सञ्चालन कर्ता थे
वो शायद अब तुम्हारे नियंत्रण
से बाहर हो गयी है
ये दम तोड़ते जीवन मूल्य
जिनमे मानव सिर्फ छटपटाकर
रह गया है/

ये जनता का लहू चूसते
राजनीतिज्ञ जोंक 
भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी की
लम्बी भीड़ 
तीसरी दुनिया के आधुनिक 
युद्धों से त्रस्त लोग 
जो सिर्फ ज़िंदगी का 
क्रूरतम रूप ही 
देख सके है/
दहेज़ की आग 
में जलती लड़कियां
लालच की समिधा
बन चुकी है/
ईमानदारी सिर्फ किताबों में
ही बसी है/
और भी न जाने क्या-क्या है
जो देश में जंग लगी कील की
तरह लोगों के पाँव में
चुभने लगा है/
तुम शायद अब कुछ
नहीं कर सकते/
सिर्फ दूर से ही
मानव जाति को विनाश की
और जाते हुए रहोगे देखते---
 


Thursday, 3 November 2011

mehak

महक
 एक  क्यारियों  वाला घर
जामुन ; अनार और
नीबू के  पेड़ों से सजा
तितलिओं से भरा
जवाकुसुम ;चंपा के पुष्पों
से ढका


बरसात में उठती
मिटटी  की सोंधी महक से महकता
 वो घर
अक्सर याद आता है /
ढेरों स्मृतियों  में
अक्सर क्यारियों
की मेड़ें
 फांदती  घर की ओर दोरती
 अपने कमरे तक पहुचती हू/  मगर फिर वापस क्यारियों में लोट  जाती हू 
तितलियों
 ओर फूलों के बीच

    
कुछ लोग  मुर्दों के नाम का सहारा लेकर जीने का प्रयास  करते है   

क्योंकि वो एक अनजानी जिन्दगी  से डरते है
 शायद वो नहीं जानते की वो क्या कर रहे है /
मुर्दों के नाम का सहरा लेकर वो मौत  से नहीं बच सकते /
वो क्यों नहीं
हिम्मत  से काम लेकर  अनजाने भय का मुकाबला करते /
शायद


 वो इस भय पर विजय प्राप्त करले और
अपने पुराने
नाम को फिर  से प्राप्त  करले /
जब नाम बदल कर मौत से लड़  नहीं पाते



Thursday, 23 June 2011

शहर जल रहा है मंत्री जी सो रहे है

शहर जल रहा है मंत्री जी सो रहे है
लोग तरस रहे मिलने को
मन की व्यथा सुनाने को
पी. ए.जी फार्म रहे है
मंत्री जी परेशां हो रहे है
देश की समस्याओं में उलझे है

चैन नहीं पा रहे है
तभी अंदर  से कोई बोला
कि मंत्री जी तो सो रहे है
मंत्री जी वापस आये केंद्र में

परधानमंत्री बोले :ये क्या 
आप तो गए थे दंगे बंद करवाने
और जा के सो गए 
 ए. सी. कमरे में
मंत्री जी बोले :काम हो जायेगा 
लोग मर रहे है आकाश तो नहीं फटेगा
आप भी आराम से सोइए/
लोग मरेगे ,  जनता पाएगे सुख
इसे तरह देश की आबादी
हो जाएगी कम!